Monday, September 10, 2018

कैसे हुई मंगलयान के खर्च में कटौती?

भारत की सरकार ने हाल के दिनों में जुगाड़ को और भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया है.
नवंबर 2013 में भारत ने मंगलयान लॉन्च किया. दस महीने बाद ये मंगल का चक्कर लगाने वाला एशिया का पहला अंतरिक्ष यान बन गया. बहुत ही कम ख़र्च में पूरे किए गए इस मिशन को आज स्पेस रेस की मिसाल माना जाता है.
भारत के मंगलयान मिशन में केवल 7.5 करोड़ डॉलर ख़र्च हुए. इसके मुक़ाबले, इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर अब तक 160 अरब डॉलर ख़र्च हो चुके हैं.
मंगलयान इतना सस्ता इसीलिए पड़ा क्योंकि भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने जुगाड़ का भरपूर इस्तेमाल किया. पुराने अंतरिक्ष यानों के पुर्ज़ों को इस्तेमाल किया गया. इसकी टेस्टिंग को भी सीमित रखकर इसे ख़र्चीला होने से बचाया गया.
मंगलयान पर काम करने वाले वैज्ञानिकों की जो तस्वीरें इसरो ने जारी कीं, उनमें भारतीय वैज्ञानिक सिर में प्लास्टिक की वो कैप पहने दिखते हैं, जो कई बार नहाने के दौरान काम में लायी जाती है.
बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा भी कि भारत ने जितने पैसे में मंगलयान भेजा, उससे ज़्यादा ख़र्च तो स्पेस मिशन पर बनी हॉलीवुड फ़िल्म ग्रैविटी को बनाने में आया.
नेल्सन कहते हैं कि, 'मंगलयान का बजट देखते ही दूसरे देशों के वैज्ञानिकों ने कहा होता कि भाई इतने पैसे में तो न हो पाएगा. मगर, भारतीय आसानी से हार नहीं मानते.'
अब तो 'जुगाड़ तकनीक' का इस्तेमाल भारत की कॉर्पोरेट दुनिया में भी ख़ूब हो रहा है. जैसे कि टाटा ग्रुप ने 'स्वच्छ' के नाम से जो वाटर प्यूरिफ़ायर बनाया है, वो बहुत सस्ता है. बिजली के बिना ही चलता है. ये उन लोगों के लिए बहुत कारगर है, जो साफ़ पानी से महरूम हैं.
टाटा ने 2009 में लखटकिया कार नैनो लॉन्च की थी, जो दुनिया की 'सबसे सस्ती कार' थी. इसमें बहुत शानदार फ़ीचर्स तो नहीं थे. मगर ये बहुत से भारतीयों का सपना पूरा करने वाली कार थी.
जुगाड़ पर आई किताब-'जुगाड़ इनोवेशन:थिंक फ्रूगल, बी फ्लेक्सिबल, जेनरेट ब्रेकथ्रू ग्रोथ' के सह लेखक जयदीप प्रभु कहते हैं कि पश्चिमी देशों के उद्यमी जो स्टार्ट-अप शुरू करना चाहते हैं, वो भारत के 'जुगाड़' का फ़ायदा उठा सकते हैं.
जयदीप कहते हैं कि, 'जुगाड़ की मदद से आप बहुत छोटी स्टार्ट अप कंपनियों को बहुत कम ख़र्च में वो काम करते देखते हैं, जो बड़ी कंपनियां मोटी रक़म ख़र्च कर के करती हैं.' वो इसकी मिसाल के तौर पर रैस्पबेरी पाई का नाम लेते हैं.
ये क्रेडिट कार्ड के बराबर के कंप्यूटर हैं, जो युवाओं को कोडिंग सीखने में मदद करते हैं. इसे कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में ईजाद किया गया था. आज यूनिवर्सिटी में तकनीक की मदद से छात्रों के समूह वो चीजें ईजाद कर रहे हैं, जिन्हें दस-बीस साल पहले केवल सरकारें या बड़ी कंपनियां ही बना पाती थीं.
वैसे, सिर्फ़ भारतीय ही नहीं कई और देशों के लोग भी जुगाड़ का हुनर रखते हैं. ब्राज़ील में इसे गैम्बियार्रा कहते हैं. वहीं चीन में इसे जिझु चुआंगचिन कहते हैं.
लेकिन, नेल्सन कहते हैं कि भारतीयों के जुगाड़ वाले हुनर की बात ही कुछ और है. वो कहते हैं कि गणपति को जो स्वरूप मिला, वो भी भारतीयों के जुगाड़ का ही प्रतीक है. जब शिव ने गणेश का सिर काट दिया था, तो उन्हें हाथी का सिर लगा दिया गया, क्योंकि किसी इंसान का सिर उस वक़्त मिल नहीं रहा था.
हिंदुस्तान के हालिया इतिहास की जड़ें 1950 के दशक की देन हैं. नेहरू सरकार के दौरान जब पश्चिमी मशीनों के कल-पुर्ज़े नहीं मिलते थे, तो उनका देसी तोड़ निकाल लिया जाता था. मुश्किल के उस दौर ने भारतीयों को नई पहचान दी. नेल्सन कहते हैं कि, 'भारतीय आविष्कारक हैं. हर मुश्किल का तोड़ निकाल लेते हैं.'
वैसे कुछ भारतीय ऐसे भी हैं जो जुगाड़ को बुरी चीज़ मानते हैं. जो घटिया दर्ज़े का काम होता है. नियमों के ख़िलाफ़ जा कर किया जाता है. जयदीप प्रभु कहते हैं कि जब उनकी किताब बाज़ार में आई थी तो बहुत से लोगों ने इसका विरोध किया था. उनका कहना था कि जिस चीज़ को बुरा माना जाता है, उसकी तारीफ़ में किताब कैसे लिखी जा सकती है.
जब दिल्ली में ऑड-इवेन फॉर्मूला लागू हुआ, तो कई दिल्लीवालों ने फ़र्ज़ी नंबर प्लेट लगाकर काम निकाला. इसी तरह बहुत से लोग हैं जो किसी से बात करना चाहते हैं तो मिस्ड कॉल करते हैं. ये ख़राब जुगाड़ की मिसालें हैं.
कई बार जुगाड़ के चक्कर में सेहत और सुरक्षा से समझौता किया जाता है. टाटा नैनो इसकी मिसाल है, जो सुरक्षा के टेस्ट में नाकाम हो गई थी.
नेल्सन कहते हैं कि कई बार जुगाड़ के चक्कर में आम भारतीय, अच्छी चीज़ों की जगह ख़राब से भी काम चला लेते हैं. अगर हमें अपनी प्रतिभा का लोहा दुनिया को मनवाना है, तो ख़राब जुगाड़ों से बचना होगा.
इस काम में तकनीक हमारी मदद कर सकती है. जयदीप प्रभु कहते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी का भारत को डिजिटल पावरहाउस बनाने का सपना इसी दिशा में उठाया गया क़दम है. भारत आज दुनिया में मोबाइल का दूसरा सबसे बड़ा बाज़ार है. मोबाइल तकनीक का बेहतर इस्तेमाल भारत को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है.
रही बात डीन नेल्सन की स्नोब्रीज़ मशीन की, तो वो काम की चीज़ निकली. हालांकि इसके लिए उन्हें रोज़ाना बीस किलो बर्फ़ मंगानी पड़ती थी, जो 60 रुपए की पड़ती थी. और ये कोई सस्ता सौदा नहीं था.
नेल्सन कहते हैं कि मशीन भले काम न आई हो, मगर जज़्बा बहुत काम का है. ये भारतीयों को हर चुनौती का तोड़ निकालने के लिए प्रोत्साहित करता है. अब ये भारतीयों पर है कि वो इस जुगाड़ की हंसी उड़ाएं या फिर उस पर गर्व करें.

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