Tuesday, July 23, 2019

क्या ओझा के इशारे पर डायन समझकर की गई हत्या? : ग्राउंड रिपोर्ट

झारखंड के गुमला ज़िले के सिसकारी गांव में डायन-बिसाही के आरोप में चार लोगों की हत्या कर दी गई है. मरने वालों में सुन्ना उरांव (60), चापा उरांव (69) उनकी पत्नी पीरा उराईन (60) और फगनी उराईन (60) शामिल हैं.
घटना रविवार तड़के तीन बजे की है. शुरुआती जांच के बाद पुलिस ने गांव के आठ लोगों को गिरफ़्तार कर लिया है.
गिरफ्तार लोगों में गांव के पाहन (मुख्य पुजारी) सुकरा उरांव, पुजार (सहायक पुजारी) तुला उरांव, कुन्दरू उरांव, लालू उरांव, राम उरांव, शुकु उरांव, महावीर उरांव और झाड़ी उरांव शामिल हैं.
गुमला के एसपी अंजनी कुमार झा ने बताया कि मामला पूरी तरह अंधविश्वास का है. गिरफ्तार लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा-147 (उपद्रव का दोषी)-148 (घातक हथियार से हमला)-149 (भीड़ द्वारा हिंसा)-302 (हत्या) और डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम-2001 के तहत एफआईआर दर्ज करा दिया गया है.
कुछ अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ भी एफ़आईआर दर्ज किया जाएगाउन्होंने यह भी बताया कि सिसकारी गांव के लोग जिस दूसरे गांव (मुर्गा) में ओझाइन (महिला ओझा) के पास पहले गए थे, वहां भी दे रही है. उन्हें जाँच के बादपुलिस दबिश गिरफ्तार किया जाएगा.
रांची ज़िला मुख्यालय से 94 किलोमीटर दूर नगर पंचायत के सिसकारी गांव में चारो तरफ़ सन्नाटा पसरा हुआ है. हत्या के बाद जिस जगह लाश रखी गई थी, वहां पुलिस का पहरा लगा दिया गया है.
सोमवार 22 जुलाई की दोपहर यहां पर ग्राम प्रधान मारवाड़ी उरांव (45), उप मुखिया रुक्मनी देवी के पति दामोदर सिंह कुछ अन्य सरकारी कर्मी मिले. उन्होंने बताया कि गांव में कुल 94 घर हैं. जिसमें 90 घर उरांव जनजाति के, लोहरा जनजाति के तीन और एक घर नागेसिया जनजाति का है.
उन्होंने यह भी बताया कि 31 जून को सीएम कृषि आशीर्वाद योजना के तहत जमा किए गए आंकड़े के मुताबिक़ मृतक चापा उरांव के पास छह एकड़ ज़मीन, सुना उरांव के पास चार एकड़ ज़मीन हैं. जबकि फगनी उराईन का रैयत पेपर नहीं मिला था, जिस वजह से पता नहीं चल पाया कि उसके पास कितनी ज़मीन हैं.
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गांव में मात्र चार घर बनाए गए हैं. किसी भी घर में शौचालय नहीं है.
बीबीसी को गांववालों से मिली जानकारी के मुताबिक़ गांव के युवक बोलो उरांव और सरकारी शिक्षक नरुआ उरांव की पत्नी की मृत्यु एक महीना पहले बीमारी की वजह से हो गई थी. वहीं एक साल पहले गौरा उरांव की पत्नी की मृत्यु भी कई बीमारियों की वजह से हो गई थी.
बोलो उरांव को शराब की लत थी. वह पहले से भी बीमार थे. नरुआ उरांव की पत्नी को किडनी संबंधी बीमारी थी.
मारवाड़ी उरांव ने बताया कि मृतक सुना उरांव, चापा उरांव और पीरी देवी हर दिन चार बजे सुबह ज़ोर-ज़ोर से मंत्र पढ़कर पूजा करते थे. अगले ही पल उन्होंने यह भी बताया कि यह मंत्र नागपुरी भाषा में करमा गीत (आदिवासी त्योहार), सरना माई का गीत हुआ करता था. जिसे खास मौक़ों पर अन्य ग्रामीण भी सरना पूजा के वक़्त गाया करते हैं.
घटनाक्रम से बारे में उन्होंने बताया कि बीते 17 जुलाई को गांव में एक सभा का आयोजन किया गया था. जिसमें 200 से अधिक ग्रामीणों के साथ वह भी मौजूद थे. बात हुई कि गांव पर किसी की बुरी नज़र लग गई है. तय किया गया कि सावन महीने के सातवें दिन यानी 24 जुलाई को गांव की देवी को एक बकरे का बलि चढ़ाकर इसे शांत किया जाएगा.
इसके बाद कुछ ग्रामीण पास के गांव चडरी टोली के ओझा जटु उरांव के पास पहुंचे. उन्होंने बताया कि गांव के हालत गंभीर हैं. उनसे नहीं संभल सकता है. किसी बड़े ओझा को दिखाओ.
एक अन्य ग्रामीण ठुमैर देवी ने बताया कि जटु उरांव की सलाह के बाद शुक्रवार 19 जुलाई को 50 से अधिक ग्रामीण रांची ज़िले के बुढ़मू प्रखंड के मुर्गी गांव के एक ओझा के पास पहुंचे. वहीं तेतरी देवी ने बताया कि उनलोगों के साथ ग्रामीणों में मृतकों में एक फगनी देवी के अलावा अन्य तीन भी शामिल थे. यही नहीं चापा उरांव और पीरी देवी के बहु-बेटे भी शामिल थे.

Thursday, July 4, 2019

كارولا راكيت: الربانة التي أضحت محورا لأحدث جدل في أوروبا

اختفت كارولا راكيت، المرأة التي تحدت وزيرا إيطاليا، وأنقذت 53 شخصا ضلوا المسار في البحر قبالة ليبيا في أعقاب تلقيها تهديدات بالقتل.
وتواجه الربانة الألمانية التي تحدت السلطات الإيطالية، تحقيقا جنائيا لتحريضها - كما يُدعى - على الهجرة غير الشرعية.
وقالت راكيت إنها كانت تحاول تجنب حدوث ما قالت إنه مأساة إنسانية.
وتعيش كارولا راكيت، ربانة القارب (سي واتش 3)، البالغة 31 عاما، "في مكان آمن، وسري بعد تلقيها تهديدات بالقتل".
وقال روبين نوغيباور، المتحدث باسم منظمة (سي واتش) غير الحكومية، لبي بي سي إن راكيت تلقت "تهديدات عدة عبر البريد الإلكتروني والرسائل النصية".
وأضاف أنها "لا يزال لديها عمل تؤديه كربانة، من قبيل تسجيل الأسماء في الدفاتر، وكتابة بعض التقارير. كما أنها أيضا بحاجة إلى الراحة".
تحدت راكيت السبت السلطات الإيطالية، بكسر حظر استمر 16 يوما، وشاركت في إنقاذ 53 شخصا في ميناء لامبيدوزا، بعد أن عثرت عليهم يهيمون في البحر قبالة ساحل ليبيا.
واعتقلت راكيت، ثم وضعت قيد الإقامة الجبرية، لكن أفرج عنها فيما بعد قاض، رأى أنها غير مذنبة في تهمة المخاطرة بحياة الناس بعد أن ضرب قاربها قارب دورية شرطة عند رصيف الميناء.
ولكنها لا تزال تواجه تحقيقات جنائية، منها - إذا ثبتت التهمة - التحريض على الهجرة غير المشروعة.
وقد سمح للمهاجرين بالنزول من السفينة، ونقلوا إلى مركز استقبال، استعدادا لتسفيرهم إلى بلدان أوروزبية أخرى، تعهدت بأخذهم.
ووصف وزير الداخلية الإيطالي، ماتيو سالفيني، الذي اتخذا موقفا متشددا من الهجرة، راكيت بأنها "قرصانة"، و"خارجة على القانون"، و"خطر على الأمن القومي"، وقال إنه يريد طردها من البلاد.
واعتذرت راكيت عن التصادم الذي حدث مع قارب الشرطة وهي تدخل الميناء، لكنها غير نادمة عن عصيانها للقواعد، قائلة إنها كانت ملزمة بأن تتفادى حدوث مأساة إنسانية، وأن تجلب المهاجرين إلى الشاطئ بعد قضائهم أكثر من أسبوعين في البحر.
ووصف سالفيني الحادثة التي وقعت السبت بأنها "عمل إجرامي، ومن أعمال الحرب"، ثم رد بغضب بعد ذلك على قرار المحكمة، قائلا: "ماذا كانت النتيجة؟ أن استرضاها القاضي بالتربيت على ظهرها، وربما احتسى معها كأسا من النبيذ".
ويقول مؤيدو راكيت إنها بطلة إنسانية: "كارولا لم يكن أمامها خيار. لقد تخلت عنها سلطات كثير من البلدان بعد أن اتصلت بها"، بحسب ما قالته جورجينا لينداردي، زميلتها في (سي واتش).
ولدت كارولا راكيت في بلدة بريتس الألمانية، ودرست في جامعة يادي، حيث حصلت على درجة جامعية في يوليو/تموز 2011، في العلوم البحرية.
وقالت جامعة يادي في بيان رسمي الاثنين: "كارولا راكيت تحملت المسؤولية عن سلامة ورفاهية وصحة الركاب الذين كانوا على ظهر السفينة".
وقال رئيس الجامعة، البروفيسور مانفريد وايزينسي، لبي بي سي: "لا شك في أنها فعلت كل شيء كما يجب في ذلك الموقف. ويؤسفني بشدة انهيار القيم الأوروبية المتفق عليها".
ويعتقد أن راكيت حصلت أيضا على درجة ماجستير في الإدارة في 2018 من جامعة إيدج هيل البريطانية، ولكن الجامعة رفضت تأكيد أو نفي ذلك.
وعملت راكيت، من نوفمبر/تشرين الثاني 2014 وحتى فبراير/شباط 2015 في شركة كروز فخمة تسمى سيلفرسي، ضابطة سلامة على متن السفينة سيلفر إكسبلورر.
ثم عملت فيما بعد في شركة بريتش أنتاركتيك البريطانية للمسح، فيما بين 2016-2017، كضابطة على متن بعض سفنها.
وبعد تركها تلك الشركة تعاونت راكيت مع منظمة غرين بيس غير الحكومية قبل أن تنتقل إلى سي واتش.
وأصبحت راكيت ربانة في سي واتش-3 في يونيو/حزيران 2019.

Thursday, June 20, 2019

英国华人关注“讲好中国故事,提升中华话语权”

《讲好中国故事,提升中华话语权——海外华人参与全球社会治理的案例》主题讲座,6月29日在位于伦敦市中心西敏市的查宁阁图书馆讲座厅内举行,会场内座无虚席,来自英国学术界、商界、侨界及社会各界的七十多位书友出席了该主题讲座
该主题讲座主讲人全球中国研究院院长、伦敦大学学院荣誉教授、着名学者常向群,多年来致力于全球中国事务研究,对于这样的一个博大主题驾轻就熟,深入浅出,娓娓道来,并针对当代的一些热点事件,英国华人关注的问题,以丰富翔实的案例,生动具体地为与会人员进行了逻辑清晰地分析和阐述。
本次讲座是“美好生活读书会”自2013年4月创办以来的总第61期。讲座由“美好生活读书会”创办人、中英着名专栏《英伦飞鸿》创办者、国际媒体人士赵雪湄主持。她指出:对于每一位海外华人而言,讲好中国故事是一个责任、一种担当、一份情怀,是对中华文化的自信与致敬,是对自己的祖国或祖籍国深深爱恋的表达;也是对住在国的一份尊重和对异域文明的一种礼尚往来。每个人都有自己的故事,怎样讲好中国故事?这里面大有门道,有艺术有技巧有方法,“美好生活读书会”愿意请到常向群这样的专家,为书友们解读其中的学问。
常向群教授首先从海外华人参与全球社会治理讲起。她介绍了哈佛大学杜维明教授关于三种中国人的界定:大陆中国人、海外中国人和文化中国人。还将全球社会及其治理的分为国家、国际组织和个人三个层面,认为所有的个人都可能通过打造全球话语平台和话语阵地来提升中华话语权。她通过“礼尚往来”、“社会建设”、“理解中国”等概念及其运作机理的介绍说明如何打造软实力,有助于理解中国话语。常教授以全球中国研究院为例,介绍如何将全球中国比较研究会、全球中国智库、全球中国对话、全球中国出版社以及全球中国社会企业和电商平台,打造成全球话语阵地,并通过提升中华学术话语实践来帮助讲好中国故事。
常教授指出,讲好中国故事和海外华人参与全球社会治理的方式是多样的,目的是塑造中国国家和国民的形象,帮助中国参与全球治理。从社会科学、人文科学的角度看,通过知识转化,一方面打造全球话语阵地来提升中华学术话语,但是这些都是手段和短期目的,另一方面,把中国和华人如何将自己的智慧贡献于人类知识体系是长远目标。把二者结合起来,参与全球社会的社会建设和综合治理,以共建人类命运共同体。
精彩的讲座引起了现场强烈的反响。问答互动环节书友们踊跃提问,涉及如何以别人愿意接受的方式讲述中国故事,如何在融入主流社会的同时保持自己的文化特色等多个话题。
常向群现场建议,并与“美好生活读书会”和英国企业家俱乐部达成共识,一起打造“在英华人转文化体验”一书,并纳入“三只眼转文化”系列丛书。
“美好生活读书会”成立五年来,先后组织举办了六十多场精彩纷呈、主题丰富的读书交流和讲座活动,内容主要涵盖文化艺术探讨、重大历史事件回顾、政策认识和解读,以及生活知识和健康理念、礼仪教育、相关故事桥段等,为在英华人提供了一个长期的文化交流平台
《讲好中国故事,提升中华话语权——海外华人参与全球社会治理的案例》主题讲座,6月29日在位于伦敦市中心西敏市的查宁阁图书馆讲座厅内举行,会场内座无虚席,来自英国学术界、商界、侨界及社会各界的七十多位书友出席了该主题讲座。
该主题讲座主讲人全球中国研究院院长、伦敦大学学院荣誉教授、着名学者常向群,多年来致力于全球中国事务研究,对于这样的一个博大主题驾轻就熟,深入浅出,娓娓道来,并针对当代的一些热点事件,英国华人关注的问题,以丰富翔实的案例,生动具体地为与会人员进行了逻辑清晰地分析和阐述。
本次讲座是“美好生活读书会”自2013年4月创办以来的总第61期。讲座由“美好生活读书会”创办人、中英着名专栏《英伦飞鸿》创办者、国际媒体人士赵雪湄主持。她指出:对于每一位海外华人而言,讲好中国故事是一个责任、一种担当、一份情怀,是对中华文化的自信与致敬,是对自己的祖国或祖籍国深深爱恋的表达;也是对住在国的一份尊重和对异域文明的一种礼尚往来。每个人都有自己的故事,怎样讲好中国故事?这里面大有门道,有艺术有技巧有方法,“美好生活读书会”愿意请到常向群这样的专家,为书友们解读其中的学问。
常向群教授首先从海外华人参与全球社会治理讲起。她介绍了哈佛大学杜维明教授关于三种中国人的界定:大陆中国人、海外中国人和文化中国人。还将全球社会及其治理的分为国家、国际组织和个人三个层面,认为所有的个人都可能通过打造全球话语平台和话语阵地来提升中华话语权。她通过“礼尚往来”、“社会建设”、“理解中国”等概念及其运作机理的介绍说明如何打造软实力,有助于理解中国话语。常教授以全球中国研究院为例,介绍如何将全球中国比较研究会、全球中国智库、全球中国对话、全球中国出版社以及全球中国社会企业和电商平台,打造成全球话语阵地,并通过提升中华学术话语实践来帮助讲好中国故事
常教授指出,讲好中国故事和海外华人参与全球社会治理的方式是多样的,目的是塑造中国国家和国民的形象,帮助中国参与全球治理。从社会科学、人文科学的角度看,通过知识转化,一方面打造全球话语阵地来提升中华学术话语,但是这些都是手段和短期目的,另一方面,把中国和华人如何将自己的智慧贡献于人类知识体系是长远目标。把二者结合起来,参与全球社会的社会建设和综合治理,以共建人类命运共同体。
精彩的讲座引起了现场强烈的反响。问答互动环节书友们踊跃提问,涉及如何以别人愿意接受的方式讲述中国故事,如何在融入主流社会的同时保持自己的文化特色等多个话题。
常向群现场建议,并与“美好生活读书会”和英国企业家俱乐部达成共识,一起打造“在英华人转文化体验”一书,并纳入“三只眼转文化”系列丛书。
“美好生活读书会”成立五年来,先后组织举办了六十多场精彩纷呈、主题丰富的读书交流和讲座活动,内容主要涵盖文化艺术探讨、重大历史事件回顾、政策认识和解读,以及生活知识和健康理念、礼仪教育、相关故事桥段等,为在英华人提供了一个长期的文化交流平台。

Sunday, June 16, 2019

वोड्नाली शिवानी वो छत से लटकी हुई पाई गई थीं

वे बताते हैं, "हम लोगों का जन्म कुछ ही दिनों के अंतर से हुआ था. हमलोग बचपन से एक ही साथ पढ़ते थे. वो मेरे हर अच्छे-बुरे काम का साथी, मेरा सबसे बेहतरीन दोस्त और सबकुछ था. हमलोग साथ में ही कॉलेज भी जाते थे. हम दोनों को मैथ्स से प्यार था. उसे कंप्यूटर लैंग्वेज की भी बेहतरीन समझ थी. उसकी वजह से ही मेरी दिलचस्पी इस क्षेत्र में जगी थी."
किरण के पिता सारंगापानी सब्जी बेचते हैं. दो कमरों के घर के एक कोने में पड़े गिटार को उन्होंने दिखाते हुए कहा कि बेटे को संगीत से भी प्यार था. कमरे में एक फोटो फ्रेम भी है जिसमें गिटार के साथ किरण की तस्वीर है.
सारंगापानी बताते हैं, "वीडियो देखकर उसने गिटार बजाना सीखा था. वो स्कूल और कॉलेज के आयोजनों में गिटार बजाता था. तेलुगू फ़िल्मों की कम से कम पांच-छह गानों की धुन वो बजा लेता था." 
किरण की मां अब तक बेटे को खोने के सदमे से उबर नहीं पाई हैं. किरण उनका इकलौता बेटा था. किरण अदब से बात करने वाला और व्यवहार वाला लड़का था.
किरण के पिता कांपती हुई जुबां में कहते हैं, "उसे अपनी तस्वीरें लेने का बड़ा शौक था. वह कई तरह के पोज बना लेता था. अब तो हमारे पास केवल तस्वीरें ही बची हैं."
जिस दिन रिजल्ट निकला, उस रात युगेश और किरण एक ही कमरे में सोए थे. युगेश के मुताबिक रात के भोजन के वक्त किरण थोड़ा डिस्टर्ब दिख रहा था.
युगेश ने बताया, "पता नहीं वो कब उठा और बाहर निकल गया. शाम में रिजल्ट के बारे में उसने ज्यादा बात नहीं की थी."
किरण का क्षत विक्षत शव रेलवे ट्रैक पर मिला था. माना जा रहा है कि मध्यरात्रि में किरण अपने घर से बाहर निकला होगा और चलती हुई ट्रेन के सामने कूद गया था.
धर्मा की करीबी दोस्त और पड़ोसी निवेदिता बताती हैं, "हम लोगों ने एक साथ 'एवेंजर्स इंड गेम' भी साथ देखने का प्लान बनाया हुआ था. अचंभे में डालने वाली चीज़ों को दीपू जबर्दस्त प्रशंसक था."
महिता कहती हैं, "वो कहा करता था कि आप तो मेरी मां जैसी हैं, मां से भी बढ़कर. मैं उसे दीपू नाम से बुलाती थी तो उसे ये नाम भी बहुत पसंद था. वो हमेशा से आकर्षण का केंद्र था. छह साल से लेकर सत्तर साल के बुजुर्ग तक उसके दोस्त थे. वो मेरे दोस्तों के साथ भी हैंगआउट कर लेता था. मेरे दोस्तों को कभी नहीं लगा कि वह छोटा है. वह काफी मच्योर था."
महिता अपने छोटे भाई के शांत रहने और किसी भी समस्या के हल तलाशने की क्षमता को लेकर अचरज में पड़ जाया करती थीं. वहीं, दीपू के कॉलेज के दोस्तों के मुताबिक़ वो शरारती तो था ही लेकिन पढ़ाई के वक्त उसका ध्यान सिर्फ़ किताबों पर ही रहता था.
दीपू की सहपाठी हर्षिणी बताती हैं, "हमलोग एक ही स्कूल से पढ़े थे. लेकिन हमारी दोस्ती कॉलेज में आकर हुई. शिक्षकों के साथ उसके मतभेद भी होते थे लेकिन उसे ये मालूम था कि कब और कहां से विवाद को आगे नहीं बढ़ाना है."
दीपू के सीनियर अभिराम बताते हैं, "दीपू हमेशा मौज-मस्ती करता हो, ऐसी बात नहीं थी. वो मुझसे गाइडेंस मांगता रहता था कि इंजीनियरिंग में कौन से विषय लेना चाहिए. उसे फीजिक्स से प्यार था. फीजिक्स को लेकर उसमें एक तरह की चाहत थी."
दीपू को संयुक्त प्रवेश परीक्षा में 84 फीसदी अंक हासिल हुए थे. महिता दीपू के कमरे को दिखाती हैं, जिसमें उसकी परीक्षाओं के टाइम टेबल और पढ़ाई का शेड्यूल मार्क किया हुआ है.
महिता कहती हैं, "मेरे भाई की एविएशन में भी खूब दिलचस्पी थी. इसलिए वो एविएशन इंजीनियरिंग पढ़ना चाहता था. वो एयरफ़ोर्स में पायलट भी बनना चाहता था इसलिए वो एनडीए परीक्षा की तैयारी भी कर रहा था."
महिता और उनकी मां ने दीपू को समझाया था कि कोई बात नहीं है और रिजल्ट ख़राब होने को लेकर बहुत चिंता करने की ज़रूरत नहीं है.
महिता बताती हैं, "उसने अपने टीचर को भी फोन कर लिया कि सर कब से ट्यूशन लेने आ जाऊं. फिर हम लोग अपने अपने काम में लग गए. दीपू वॉशरूम चला गया. हमलोग उसे कुछ स्पेस देना चाहते थे. लेकिन जल्दी ही हमने धमाके की आवाज़ सुनी और देखा कि दीपू बालकनी से कूद गया था."
ठीक 15 दिन बाद हमलोग शिवानी के माता-पिता से मिलने गए थे. जब हम उनकी गली में मुड़े तभी से शिवानी की मां के रोने की आवाज़ सुनाई दे रही थी. तेलंगाना के एक गांव के खपरैल वाले घर में हम पहुंचे थे जिसके आसपास एकमंजिला घर थे.
शिवानी का परिवार बीते आठ सालों से इस घर में किराए पर रह रहा है. लावण्या के पास अपनी बेटी की लैमिनेटेड तस्वीर वाला पोस्टर है, जिस पर लिखा हुआ है, "मैं इंजीनियर बनना चाहती हूं."
शिवानी के पिता भूमा रेड्डी अपनी पत्नी के बगल में बैठकर ये समझने की कोशिश करते हैं कि हमलोग किस बारे में बात कर रहे हैं. वे कान से सुन नहीं पाते. लेकिन थोड़ी देर में उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि बेटी की बात हो रही है तो बोल पड़े, "मेरी बेटी बहुत ही तेज़ थी." 
शिवानी की पहचान एक तेज स्टूडेंट की थी. उसके दोस्तों ने बताया कि वे अपनी मुश्किलों के हल के लिए शिवानी के पास आते थे.
उनकी दोस्त अनीता कहती हैं, "उसे अपने दोस्तों के घर जाना पसंद नहीं था, तो पढ़ने के लिए हम ही उसके घर आ जाते थे."
शिवानी से तीन साल छोटी अनुषा ने हमें बताया, "अक्का को चूड़ियां बेहद पसंद थी. वो अलग अलग रंगों की चूड़ियां खरीदती थीं, उसे पहनकर तस्वीरें खिंचवाती थीं."
सोने के कमरे की दीवार पर शिवानी का एग्ज़ाम शेड्यूल और स्टडी प्लान का टाइम टेबल लगा हुआ था. टाइम टेबल के मुताबिक़ शिवानी पढ़ने के लिए हर दिन चार बजे सुबह उठा करती थीं. 
शिवानी काफी मेहनत करके इंजीनियर बनना चाहती थीं. लावण्या बताती हैं, "वो अपने पिता से कहा करती थीं कि पशुओं को चराने मत जाया करो क्योंकि वे शारीरिक तौर पर विकलांग हैं. वो कहा करती थीं कि बस पांच साल इंतजार करो, हमारी ज़िंदगी बदलने वाली है."
इस दौरान कुछ पड़ोसी भी आ जाते हैं, हर कोई यही बताता है कि शिवानी शर्मीली और बहुत अच्छा व्यवहार करने वाली लड़की थी.
जिस दिन रिजल्ट निकला, उस दिन शिवानी ने अपना फोन अनुषा को दिया और फोन को अनलॉक करने का पासवर्ड भी बता दिया.
अनुषा याद करती हैं, "अक्का (दीदी) कभी मुझे अपना फोन नहीं दिया करती थीं. वो कहती कि पढ़ाई पर ध्यान दो, मोबाइल फोन पर समय बर्बाद मत करो. लेकिन उस दिन उसने कहा था कि अब फोन इस्तेमाल कर सकती हो." 
अगली सुबह अनुषा ने सबसे पहले शिवानी को छत से लटकते हुए देखा था. अनुषा कहती है, "अब भी मैं रातों को सो नहीं पाती हूं."

Tuesday, May 28, 2019

华为断供危机会不会殃及非洲消费者

多家美国公司在美国政府对中国科技公司华为实施制裁后随即宣布停止与华为的合作、或暂停出售华为手机。这被视为一场科技冷战的开始。分析称,非洲也可能受到这场争斗的影响。
华为的网络基建设备和手机在非洲十分受欢迎。BBC记者奥维(Dickens Olewe)形容,大部份使用手机上网的非洲人“很大可能用一个中国品牌手机、透过一个使用中国设备建成”的网络连到互联网,而这些人当中最少一半正在使用华为的手机。
设于南非的研究中非项目(China Africa Project)研究员奥兰德(Eric Olander)指出,华为在非洲建设了大量基础建设。“如果美国真的成功令这家公司无法运作,非洲近年冒起的科技企业将十分痛苦,因为它们依靠的公司被美国针对。”
谷歌前首席执行官施密特(Eric Schmidt)曾经指出,美国政府的行动无可避免会把互联网分为两部份:一部份由中国主导、一部份由美国主导。
肯尼亚中非关系专家卡里乌基(Harriet Kariuki)认为,如果一分为二的情况真的出现,非洲不应选边站。她接受BBC访问时解释,那不是非洲的争夺战,非洲应该“专注做对自己有用的事情”。
她形容,非洲应该利用这个机会发展适合自身市场的科技,而不是继续被动地购买其他地方的产品。“我希望非洲国家可以合作,抵抗这种慢慢侵蚀的数码殖民主义。”
美国、澳大利亚等国家指控华为的产品会造成安全隐忧,先后禁止它参与建设这些国家的5G通讯网络。在这之前,华为在非洲国家也爆出过类似争议。
华为早前获得订单,为位于埃塞俄比亚首都亚的斯亚贝巴的非洲联盟总部装设电脑伺服器。这个总部大楼2012年完成,建筑费约2亿美元,全部由中国资助。时任中国政协主席贾庆林当时出席了开幕仪式,形容大楼是中国给非洲的“又一珍贵礼物”,体视了“中国对非洲国家联合自强和一体化进程的支持”。
法国《世界报》2018年报道,这个非盟总部的伺服器启用以来,每天晚上半夜到早上2时被发现把资料传送到一些位于上海的伺服器,情况持续约五年,非盟的工作人员并不知情。中国和非洲联盟官方都否认《世界报》报道内的指控。
BBC记者奥维分析,非洲国家在这次华为和美国的争端中没有发声,原因不难明白:华为制造的智能手机在非洲市场占有率很高,它也为许多非洲
华为1998年在非洲开设首家办公室,分析认为它在取得非洲5G合约的竞争中十分有优势。南非国际事务研究所中国关系研究员斯塔登(Cobus van Staden)指出,华为是第一家发现非洲资讯科技业潜力的公司,它也有资金支持自己在当地的投资。
他接受BBC访问时指出,中国政府给非洲提供援助的时候,会要求受惠国使用中国公司的服务,这也帮助华为在当地扩展业务。
市场调研机构国际数据公司(IDC)的资料指出,华为智能手机在非洲的销量排名第四,排在同样是中国公司的传音公司和韩国的三星后。这些公司制造的手机全都使用谷歌的安卓操作系统。
斯塔登认为,美国对华为的禁令在非洲市场引起了一定忧虑,但华为仍然可以反击。“搞懂非洲市场的美国公司不多,它们不会为非洲设计产品。但华为可以利用目前的情况,创造真正为非洲使用者服务的产品。”
他指出,便宜的中国手机让许多非洲人可以连接上网,他们注重的是手机能否同时使用两张SIM卡、电池充电后可以用多久等功能,而不是追求某一个操作系统。
分析认为,目前的情况会令华为最终研发自己的软件和操作系统,但这不会是容易的事。中国也不大可能说服中国以外的使用者使用百度和新浪微博,来取代谷歌和推特等服务。
研究中非关系多年的学者加利亚多内(Iginio Gagliardone)接受BBC访问时指出,非洲不应选边站,如果非洲在这场科技战争中形成一个不结盟运动,将十分有趣。他的研究发现,中国没有主动要求非洲国家使用中国版本的互联网产品,而是按非洲要求提供一些当地需要的服务。
加利亚多内认为,中国可以利用它与非洲国家的关系,要求对方发展一些对中国公司有利的技术,但这不会影响非洲消费者,他们仍然可以选择不同产品。
但南非莫亚研究院学者弗兰斯曼(Fazlin Fransman)认为,非洲国家选择大量使用中国公司的通讯产品,它在这场科技战已经选择靠拢中国。
国家建立了4G通讯网络。
肯尼亚一家主要无线网络公司萨法利通讯(Safaricom)的首席执行官科利莫尔(Bob Collymore)早前接受访问时形容,华为“多年来都是个好伙伴”。

Tuesday, April 30, 2019

'हिममानव' के पहली बार मिले निशान, भारतीय सेना का दावा

भारतीय सेना ने दावा किया है कि पर्वतारोहण अभियान टीम को पहली बार रहस्मय 'येती' यानी हिममानव के पैरों के निशान मिले हैं.
सेना के ऑफ़िशियल ट्विटर हैंडल से कुछ तस्वीरें भी साझा की गई हैं. इन तस्वीरों में बर्फ़ पर बड़े पैरों के निशान दिख रहे हैं.
एडीजीपीआई का कहना है कि मकालू बेस कैंप में 9 अप्रैल को खींची इन तस्वीरों में दिख रहे पैरों के निशान 32x15 इंच के हैं.
सेना के मुताबिक़, मकालू बारुण के नेशनल पार्क में ये कम दिखने वाला हिममानव पहले भी देखा गया गया है.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर लिखा, ''बीजेपी ज़रूर इस पर काम कर रही होगी कि कैसे हिममानवों के मुद्दे को अपने चुनावी प्रचार में इस्तेमाल करे.''
हालांकि ज़्यादातर लोग इन तस्वीरों पर चुटकियां भी ले रहे हैं.
रूद्र लिखते हैं, ''ज़रूर ये हिममानव मोदीजी को वोट करने बाहर आए होंगे.''
@ हैंडल से लिखा गया- ''सर एक मंदिर बनाने की ज़रूरत है.''
चौकीदार मृत्युंजय शर्मा
आदर्श रस्तोगी लिखते हैं, ''आना तो मोदी को था. ये कहां से आ गया? इसका वोटर आईडी कार्ड कहां है?''
@ ने ट्वीट किया, ''एक पैर क्यों
तिब्बत और नेपाल की लोकप्रिय काल्पनिक कथाओं के मुताबिक़, एशिया के सुदूर पर्वतीय इलाकों में दैत्याकार बंदर जैसे जीव रहते हैं, जिन्हें येती या हिममानव कहा जाता है.
सालों से लोगों की ओर से येती को देखे जाने के दावे किए जाते रहे हैं.
साल 2013 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में की रिसर्च में ये दावा किया गया था कि हिमालय के मिथकीय हिम मानव 'येती' भूरे भालुओं की ही एक उप-प्रजाति के हो सकते हैं.
प्रोफे़सर स्काइज़ ने बीबीसी को बताया था कि येती के मिथक के पीछे हो सकता है कि वास्तव में कोई जीव हो.
उन्होंने कहा था, ''मैं समझता हूं कि वह भालू जिसे किसी ने भी जीवित नहीं देखा है, हो सकता है कि अभी भी वहां मौजूद हो.''
अमरीकी जीवविज्ञानी शॉर्लट लिंडक्विस्ट ने भी इस बारे में कुछ काम किया है. उन्होंने येती के अवशेषों का डीएनए टेस्ट के ज़रिए विश्लेषण किया था.
इन अवशेषों के नमूनों में हाथ, दांत, हाथ की त्वचा, बाल और मल मिले हैं जो तिब्बत और हिमालयी इलाकों में मिले थे.
लिंडक्विस्ट ने बीबीसी को बताया था, "जांच के दौरान उपलब्ध नौ नमूनों में से एक कुत्ते का निकला जबकि अन्य उस इलाके में रहने वाले आठ अलग-अलग प्रजातियों के भालू के हैं, जैसे एशियाई काले भालू, हिमालय और तिब्बत के भूरे भालू के."
एक शोधकर्ता के मुताबिक़, "जिस नमूने की मैंने जांच की वो 100 फ़ीसदी भालू के थे."
दिख रहा है. लगता है येती लंगड़ी खेल रहा था. तभी उसका दूसरा पैर नहीं दिख रहा है.''
ने सवाल किया, ''इन तस्वीरों में सिर्फ़ एक पैर का निशान क्यों दिख रहा है?''

Tuesday, April 9, 2019

चीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

वो कहती हैं, "मिट्टी के कच्चे मकान में टाइम काट रहे हैं. पूरे गांव में हमारा ही मकान सबसे कच्चा है लेकिन किसी ने हमारा घर नहीं बनवाया है."
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कश्मीरी जैसे ग़रीब परिवारों का घर बनाने में सरकार ढाई लाख रुपए तक मदद करती है.
लेकिन कश्मीरी की मदद करने अभी तक कोई नहीं आया है. वो कहती हैं कि उनकी भाग-दौड़ करने वाला कोई नहीं है.
यहां से कुछ दूर ही जयपाली अपनी एक पड़ोसन के साथ मिलकर खेत काटने में जुटी हैं.
उनका दर्द भी वैसा ही है जैसा कश्मीरी और राजेंद्री का. साल भर के खाने के इंतज़ाम करने के लिए वो ये काम कर रही हैं.
वो कहती हैं, "काम क्या कर रहे हैं, गर्मी में मर रहे हैं. ना करेंगे तो बच्चे कैसे पलेंगे. गर्मी हो या सर्दी हमें तो मेहनत ही करनी है."
वो कहती हैं, "पहले बिजली का बिल कम आता था. अब हज़ार रुपए महीना आ रहा है. हम जैसा ग़रीब आदमी कहां से इतना बिल भरेगा. बढ़-बढ़कर पैंतीस हज़ार हो गया है. कोई हमारा बिल कम करा दे तो बड़ी मदद हो."
उन्हें किसी सरकार या पार्टी के वादे पर कोई भरोसा नहीं है. लेकिन जब उन्हें सीधे खाते में पैसे आने की प्रस्तावित योजना के बारे में बताया गया तो उन्होंने कहा, "अगर ऐसा हो जाए, सीधे पैसा हमारे खाते में आ जाए तो हम यहां ख़ून क्यों जलाएंगे."
यहां से क़रीब पचास किलोमीटर दूर गंगनहर के किनारे बसे मेरठ ज़िले के भोला झाल गांव की रहने वाली मुन्नी देवी अपनी बेटियों को साथ लिए जंगल जा रही हैं.
उनके हाथ में दरांती है.
वो कहती हैं, "लकड़ी काटने जा रहे हैं. जंगल से लकड़ी काटेंगे तो घर में शाम को चूल्हा जलेगा और खाना बनेगा."
केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना का फ़ायदा मुन्नी को नहीं मिला है. उनके साथ जा रही उनकी नाबालिग़ बेटी निशा आगे पढ़ना चाहती है लेकिन जल्द ही उसकी शादी कर दी जाएगी.
निशा अभी शादी नहीं करना चाहती.
लेकिन कहती है, "मम्मी-पापा मजबूर हैं. घर में कुछ नहीं है. क़र्ज़ चढ़ा है. मकान गिरवी रखा है, मेरे पास आगे कोई रास्ता नहीं है."
निशा कहती है, "पैसे की तंगी में पढ़ाई छूट गई. पापा ने चालीस हज़ार साहूकार से लिए थे. अब बढ़कर ढाई लाख हो गए हैं. हमें किसी भी दिन घर से निकाला जा सकता है."
लकड़ी काटने जा रही मुन्नी देवी को ये काम निपटा कर गेहूं काटने जाना है. उन्हें सिर्फ़ खाने के लिए गेहूं का ही नहीं बल्की चूल्हे के लिए ईंधन का भी इंतज़ाम करना है.
उन्हें अपनी बेटी की पढ़ाई छूटने का अफ़सोस हैं.
वो कहती हैं, "हम ग़रीबों की कोई मदद नहीं करता. बेटी की शादी हो जाएगी तो एक फ़िक्र निबटेगी."
मुन्नी के पति मज़दूरी करते हैं और अक्सर शाम को दारू पीकर झगड़ा करते हैं.
चुनावी मौसम में उन्हें किसी नेता से कोई उम्मीद नहीं हैं. वो कहती हैं, "हम जैसे गऱीबों का कोई कुछ नहीं करता. आप कुछ करा दो तो भला हो."
गेहूं की फ़सल काट रही जितनी भी महिलाओं से मैं मिली वो दलित वर्ग से थीं. हेमा मालिनी की तस्वीर उनकी मेहनत और ज़िंदगी की मुश्किलों के साथ मज़ाक़ सी लगती है.
केंद्र और राज्य सरकारों ने हाल के महीनों में किसानों के लिए क़र्ज़माफ़ी का ऐलान किया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसान सम्मान निधी के तहत सीधे किसानों के बैंक खातों में दो हज़ार रुपये भी भेजे हैं.
लेकिन केंद्र सरकार की ऐसी किसान हितैषी योजनाओं का फ़ायदा राजेंद्री और जयपाली जैसी महिलाओं को नहीं मिलता.
सरकार की योजना का फ़ायदा तो क्या इन भूमिहीन मज़दूर महिलाओं को तो अपनी मेहनत का सही दाम तक नहीं मिलता.