Tuesday, April 30, 2019

'हिममानव' के पहली बार मिले निशान, भारतीय सेना का दावा

भारतीय सेना ने दावा किया है कि पर्वतारोहण अभियान टीम को पहली बार रहस्मय 'येती' यानी हिममानव के पैरों के निशान मिले हैं.
सेना के ऑफ़िशियल ट्विटर हैंडल से कुछ तस्वीरें भी साझा की गई हैं. इन तस्वीरों में बर्फ़ पर बड़े पैरों के निशान दिख रहे हैं.
एडीजीपीआई का कहना है कि मकालू बेस कैंप में 9 अप्रैल को खींची इन तस्वीरों में दिख रहे पैरों के निशान 32x15 इंच के हैं.
सेना के मुताबिक़, मकालू बारुण के नेशनल पार्क में ये कम दिखने वाला हिममानव पहले भी देखा गया गया है.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर लिखा, ''बीजेपी ज़रूर इस पर काम कर रही होगी कि कैसे हिममानवों के मुद्दे को अपने चुनावी प्रचार में इस्तेमाल करे.''
हालांकि ज़्यादातर लोग इन तस्वीरों पर चुटकियां भी ले रहे हैं.
रूद्र लिखते हैं, ''ज़रूर ये हिममानव मोदीजी को वोट करने बाहर आए होंगे.''
@ हैंडल से लिखा गया- ''सर एक मंदिर बनाने की ज़रूरत है.''
चौकीदार मृत्युंजय शर्मा
आदर्श रस्तोगी लिखते हैं, ''आना तो मोदी को था. ये कहां से आ गया? इसका वोटर आईडी कार्ड कहां है?''
@ ने ट्वीट किया, ''एक पैर क्यों
तिब्बत और नेपाल की लोकप्रिय काल्पनिक कथाओं के मुताबिक़, एशिया के सुदूर पर्वतीय इलाकों में दैत्याकार बंदर जैसे जीव रहते हैं, जिन्हें येती या हिममानव कहा जाता है.
सालों से लोगों की ओर से येती को देखे जाने के दावे किए जाते रहे हैं.
साल 2013 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में की रिसर्च में ये दावा किया गया था कि हिमालय के मिथकीय हिम मानव 'येती' भूरे भालुओं की ही एक उप-प्रजाति के हो सकते हैं.
प्रोफे़सर स्काइज़ ने बीबीसी को बताया था कि येती के मिथक के पीछे हो सकता है कि वास्तव में कोई जीव हो.
उन्होंने कहा था, ''मैं समझता हूं कि वह भालू जिसे किसी ने भी जीवित नहीं देखा है, हो सकता है कि अभी भी वहां मौजूद हो.''
अमरीकी जीवविज्ञानी शॉर्लट लिंडक्विस्ट ने भी इस बारे में कुछ काम किया है. उन्होंने येती के अवशेषों का डीएनए टेस्ट के ज़रिए विश्लेषण किया था.
इन अवशेषों के नमूनों में हाथ, दांत, हाथ की त्वचा, बाल और मल मिले हैं जो तिब्बत और हिमालयी इलाकों में मिले थे.
लिंडक्विस्ट ने बीबीसी को बताया था, "जांच के दौरान उपलब्ध नौ नमूनों में से एक कुत्ते का निकला जबकि अन्य उस इलाके में रहने वाले आठ अलग-अलग प्रजातियों के भालू के हैं, जैसे एशियाई काले भालू, हिमालय और तिब्बत के भूरे भालू के."
एक शोधकर्ता के मुताबिक़, "जिस नमूने की मैंने जांच की वो 100 फ़ीसदी भालू के थे."
दिख रहा है. लगता है येती लंगड़ी खेल रहा था. तभी उसका दूसरा पैर नहीं दिख रहा है.''
ने सवाल किया, ''इन तस्वीरों में सिर्फ़ एक पैर का निशान क्यों दिख रहा है?''

Tuesday, April 9, 2019

चीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

वो कहती हैं, "मिट्टी के कच्चे मकान में टाइम काट रहे हैं. पूरे गांव में हमारा ही मकान सबसे कच्चा है लेकिन किसी ने हमारा घर नहीं बनवाया है."
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कश्मीरी जैसे ग़रीब परिवारों का घर बनाने में सरकार ढाई लाख रुपए तक मदद करती है.
लेकिन कश्मीरी की मदद करने अभी तक कोई नहीं आया है. वो कहती हैं कि उनकी भाग-दौड़ करने वाला कोई नहीं है.
यहां से कुछ दूर ही जयपाली अपनी एक पड़ोसन के साथ मिलकर खेत काटने में जुटी हैं.
उनका दर्द भी वैसा ही है जैसा कश्मीरी और राजेंद्री का. साल भर के खाने के इंतज़ाम करने के लिए वो ये काम कर रही हैं.
वो कहती हैं, "काम क्या कर रहे हैं, गर्मी में मर रहे हैं. ना करेंगे तो बच्चे कैसे पलेंगे. गर्मी हो या सर्दी हमें तो मेहनत ही करनी है."
वो कहती हैं, "पहले बिजली का बिल कम आता था. अब हज़ार रुपए महीना आ रहा है. हम जैसा ग़रीब आदमी कहां से इतना बिल भरेगा. बढ़-बढ़कर पैंतीस हज़ार हो गया है. कोई हमारा बिल कम करा दे तो बड़ी मदद हो."
उन्हें किसी सरकार या पार्टी के वादे पर कोई भरोसा नहीं है. लेकिन जब उन्हें सीधे खाते में पैसे आने की प्रस्तावित योजना के बारे में बताया गया तो उन्होंने कहा, "अगर ऐसा हो जाए, सीधे पैसा हमारे खाते में आ जाए तो हम यहां ख़ून क्यों जलाएंगे."
यहां से क़रीब पचास किलोमीटर दूर गंगनहर के किनारे बसे मेरठ ज़िले के भोला झाल गांव की रहने वाली मुन्नी देवी अपनी बेटियों को साथ लिए जंगल जा रही हैं.
उनके हाथ में दरांती है.
वो कहती हैं, "लकड़ी काटने जा रहे हैं. जंगल से लकड़ी काटेंगे तो घर में शाम को चूल्हा जलेगा और खाना बनेगा."
केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना का फ़ायदा मुन्नी को नहीं मिला है. उनके साथ जा रही उनकी नाबालिग़ बेटी निशा आगे पढ़ना चाहती है लेकिन जल्द ही उसकी शादी कर दी जाएगी.
निशा अभी शादी नहीं करना चाहती.
लेकिन कहती है, "मम्मी-पापा मजबूर हैं. घर में कुछ नहीं है. क़र्ज़ चढ़ा है. मकान गिरवी रखा है, मेरे पास आगे कोई रास्ता नहीं है."
निशा कहती है, "पैसे की तंगी में पढ़ाई छूट गई. पापा ने चालीस हज़ार साहूकार से लिए थे. अब बढ़कर ढाई लाख हो गए हैं. हमें किसी भी दिन घर से निकाला जा सकता है."
लकड़ी काटने जा रही मुन्नी देवी को ये काम निपटा कर गेहूं काटने जाना है. उन्हें सिर्फ़ खाने के लिए गेहूं का ही नहीं बल्की चूल्हे के लिए ईंधन का भी इंतज़ाम करना है.
उन्हें अपनी बेटी की पढ़ाई छूटने का अफ़सोस हैं.
वो कहती हैं, "हम ग़रीबों की कोई मदद नहीं करता. बेटी की शादी हो जाएगी तो एक फ़िक्र निबटेगी."
मुन्नी के पति मज़दूरी करते हैं और अक्सर शाम को दारू पीकर झगड़ा करते हैं.
चुनावी मौसम में उन्हें किसी नेता से कोई उम्मीद नहीं हैं. वो कहती हैं, "हम जैसे गऱीबों का कोई कुछ नहीं करता. आप कुछ करा दो तो भला हो."
गेहूं की फ़सल काट रही जितनी भी महिलाओं से मैं मिली वो दलित वर्ग से थीं. हेमा मालिनी की तस्वीर उनकी मेहनत और ज़िंदगी की मुश्किलों के साथ मज़ाक़ सी लगती है.
केंद्र और राज्य सरकारों ने हाल के महीनों में किसानों के लिए क़र्ज़माफ़ी का ऐलान किया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसान सम्मान निधी के तहत सीधे किसानों के बैंक खातों में दो हज़ार रुपये भी भेजे हैं.
लेकिन केंद्र सरकार की ऐसी किसान हितैषी योजनाओं का फ़ायदा राजेंद्री और जयपाली जैसी महिलाओं को नहीं मिलता.
सरकार की योजना का फ़ायदा तो क्या इन भूमिहीन मज़दूर महिलाओं को तो अपनी मेहनत का सही दाम तक नहीं मिलता.